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शोषण के विरुद्ध अधिकार

अनुच्छेद 23–24 · बलात् श्रम और बाल शोषण का निषेध।

अवलोकन

शोषण के विरुद्ध अधिकार एक अद्वितीय और पूर्ण मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 19 के तहत अधिकारों के विपरीत, इसमें कोई अपवाद नहीं हैं — कोई उचित प्रतिबंध नहीं, कोई सार्वजनिक हित का अतिक्रमण नहीं। संविधान मानव तस्करी, बलात् श्रम और बाल श्रम को मानवीय गरिमा का मौलिक उल्लंघन मानता है।

यह अधिकार सभी व्यक्तियों — नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिए उपलब्ध है।

अनुच्छेद 23: मानव दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध

पाठ: "मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात् श्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध होगा।"

मुख्य प्रावधान

अपवाद: सार्वजनिक उद्देश्य

अनुच्छेद 23(2) एक संकीर्ण अपवाद प्रदान करता है: राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा लगा सकता है, जैसे:

महत्वपूर्ण: इस अपवाद के तहत भी, राज्य को ऐसी अनिवार्य सेवा करते समय धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।

ऐतिहासिक मामले

अनुच्छेद 24: बाल श्रम का प्रतिषेध

पाठ: "चौदह वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नहीं लगाया जाएगा।"

मुख्य बिंदु

विधायी ढाँचा

ऐतिहासिक मामले

स्रोत

अंतिम अद्यतन: 2026-08-06

प्राथमिक स्रोत:

  • भारत का संविधान, भाग III — india.gov.in
  • सर्वोच्च न्यायालय, Bandhua Mukti Morcha v. Union of India (1984) — indiankanoon.org
  • सर्वोच्च न्यायालय, People's Union for Democratic Rights v. Union of India (1982) — indiankanoon.org
  • बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 — legislative.gov.in

अनुसंधान:

  • डी.डी. बसु, भारत के संविधान का परिचय (लेक्सिसनेक्सिस)