संविधान के आदर्श, उद्देश्य और दर्शन।
"हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक;
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता;
प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए;
अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"
यह प्रश्न कि क्या प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई ऐतिहासिक निर्णयों में तय किया गया था:
सर्वोच्च न्यायालय ने शुरू में माना कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं थी और इसलिए इसमें संशोधन नहीं किया जा सकता था। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि प्रस्तावना केवल "निर्माताओं के दिमाग को खोलने की कुंजी" थी और इसका अपना कोई कानूनी बल नहीं था।
इस ऐतिहासिक 13-न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय में, सर्वोच्च न्यायालय ने बेरुबारी के दृष्टिकोण को पलट दिया और माना कि:
न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत पेश किया, जो संसद की संशोधन शक्ति को सीमित करता है। प्रस्तावना, मूल संरचना को मूर्त रूप देते हुए, केवल उन तरीकों से संशोधित की जा सकती है जो इसके आवश्यक चरित्र को नहीं बदलते हैं।
केशवानंद भारती के फैसले के बाद, प्रस्तावना में एक बार संशोधन किया गया था:
इस संशोधन को बाद के मामलों में मूल संरचना का उल्लंघन न करने के रूप में बरकरार रखा गया था।
अंतिम अद्यतन: 2026-08-06
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